लोग

लोग गढ़वाल

कार्य करती महिला

भौगोलिक महत्व, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण एक विशिष्ट ऐतिहासिक परम्परा और धार्मिक महत्व है।  पौड़ी गढ़वाल के लोग अपनी जीवन शैली की समृद्ध विरासत को, जो उनके कठिन आर्थिक और दिन-प्रतिदिन  कड़ी मेहनत, कार्य शैली और शारीरक श्रम में विश्वास के साथ जुड़ा है को साझा करते है । शहरी क्षेत्रों  और यात्रा मार्गों की आबादी ने अपनी संस्कृति को  यात्रिओं के साथ मिलकर देश के दूसरे हिस्से से पहुचाया है। एक गढ़वाली कद में छोटे, कठोर, मेहनती और होते हैं । वे सरल और शर्मीले तथा प्रकृति के सबसे करीब होते हैं।
जिले में  मिश्रित समाज है – जिसमे  ब्राह्मण, राजपूत, हरिजन (अनुसूचित जाति) प्रमुख घटक हैं। प्रत्येक जाति समूह  उप-समूहों और उप-जातियों में विभाजित है। ग्रामीणों का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन है

रिवाज और परम्पराएँ

जिले के विभिन्न रिवाजों और परंपराएं हिंदु धर्म पर आधारित हैं। “शिव” को सबसे अधिक पूजा जाता है और विभिन्न रूपों में “दुर्गा”  की पूरे जिले में पूजा की जाती है। जिले में अधिकांश मेलों और त्यौहारों शिव और दुर्गा की पूजा की जाती है।धार्मिक आस्था और अंधविश्वास लोगों में गहरे से बसे हुए हैं। प्राचीन रीति-रिवाजों और परंपराओं  के अनुसार जन्म, विवाह, मृत्यु कार्यकर्म किया जाते हैं । लोग ब्राह्मणों की ज्योतिषीय भविष्यवाणी बहुत अधिक निर्भर रहते है है।
हिंदू धर्म के देवताओं के अलावा, स्थानीय देवताओं की भी लोगों द्वारा पूजा की जाती है इसमें “निरंकार”, “नरसिंह”, “भैरों”, “नागराज”, “क्षेत्रपाल” आदि शामिल हैं। लोग भूत, प्रेत आदि में विश्वास करते हैं और तंत्र-मंत्र का प्रयोग रोग का इलाज करने और आपदाओं को रोकने के लिए किया जाता है। तंत्र-मंत्र कुछ रीति-रिवाजों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है जिन्हें “सिद्धपीठ” स्थानों तथा दो नदियों के संगम किया जाता है। जिले में बिनसर महादेव, क्यूंकालेश्वर मंदिर, कांडा, ज्वाल्पा देवी, धारीदेवी जैसे स्थानों में इस तरह की प्रथाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं।बहुत सारे मेलों और त्योहार में देवी देवतायों की पूजा के लिए बछड़ों, बकरियां और भेड़ का बलिदान किया जाता है। “जगरी ” या “गरुड़ी” या “धामी”  “भूत”, “प्रेत” और “नाराज़  भगवान ” की वजह से पीड़ितों का इलाज करते  हैं ।”बक्या”  मुसीबत में फसें लोगों के अतीत और भविष्य को पड़ता है और समाधान देता  है जिसमें बलिदान और अनुष्ठान शामिल हो सकते हैं

परिधान और गहने

विकासशील समाज और बाहर के लोगों के बढ़ते प्रभाव के साथ, पारंपरिक परिधान लगभग विलुप्त हो गए हैं। अब केवल “कमरबंद”, कमर पर बंधे जाने वाला  और “जुल्का”, एक चादर जिसे सिर पर रखा जाता है, वृद्ध महिलाओं और महिलाओं को सीढ़ीदार खेतों में काम करते हुए देखा जा सकता  है । आभूषण का व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है। पारंपरिक आभूषण में नाक के गहने “नथ”, “फुली” और “बुलाक ” शामिल हैं कानों के लिए  “मुर्खाला”, “टॉप”, “कुंडल” पहना जाता है। गले के लिए  “हंसुली”, “माला”, “कंडी” और “गुलबंद” शामिल हैं। चूड़ी में “धगूले” और “कंगन” शामिल हैं पैर के गहने में “झिंवारा”, “पौंट”, “लाछा” और “धुगला” शामिल ह

परिधान और गहने गढ़वाल में

परिधान और गहने

खाना

जलवायु की स्थिति के कारण, लोग आम तौर पर मांस खाने वाले होते हैं। यहां तक कुछ ब्राह्मण भी मांस खाते हैं। रोटी जो की “मंडुवा” और “भट्ट” के आटे और “जिंगोरा” और “काओनी” जो की एक प्रकार का पक्का हुआ चावल होता हिया लोगों का पारंपरिक भोजन है। दालो में  “उड़द”, “गहट”, “भट्ट”, “थोरा”, “रयांश”, “चिममी”, “मसूर” आदि शामिल हैं । अन्य व्यंजनों में “बडी”, “चेंसू”, “भट्टवाणी”, “छैंच्या”, “रोट” आदि  शामिल हैं। विशेष अवसर, “दल की पकोड़ी “, “स्वाले”, “अरसे”, “हलवा” आदि बनाये जाते हैं । विवाहित बेटी को  अरसे और रोट की कंडी अपने ससुराल ले जाने के लिए दिए जाते हैं । परंपरागत रूप से, सुभ अवसर पर गुड से बनी “भेली” को तोडा जाता है और सभी ग्रामीणों को वितरित किया जाता है।